बच्चपन

बच्चपन का वो जमाना भी  क्या जमाना था
सब थे अपने ना कोई बेगाना था
कोमल तन नाजुक मन
बस जीने का बहाना था
बच्चपन का वो जमाना भी  क्या जमाना था

 

कहानियों में तलाश जीवन की
खेलना कूदना और डांट टीचर की
माँ बाप पूरा संसार था
तभी तो उनसे प्यार था
नदान थे अनजान थे
इस संसार के नियमो से
मासूम चेहरा , मन साफ़ दर्पण सा
मन में भाव समर्पण का
…………. का वो जमाना भी  क्या जमाना था

 

शारीर में न बल था, न ही कोई छल था
घमंड न था शक्ल सूरत और अकल का
न किसी से द्वेष न बैर था
तभी तो सब अपने थे ना कोई गैर था
काश वोह पल वापिस आ पाते
तो सारे संसार के झगड़े पल में मिट जाते
यह धरती स्वर्ग होती हर घर होता मंदिर

जरा सोच ओ इंसान इस धरती का क्या होता मंज़र

उमर ने ली करवट शुरू इक नया अध्याय हुआ
चला गया बचपन अब जवानी का आगाज़ हुआ !!!
लेकिन
………….. का वो जमाना भी  क्या जमाना था

 

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