इंसान की ज़िन्दगी के दिन

इंसान की ज़िन्दगी के दिन यूँ ही ढल रहे हैं
रेत के दाने जैसे हाथ से फिसल रहे हैं
मिले हैं ये जो गिनती के अनमोल श्वास इसको
लगता है के फ़िज़ूल खर्ची में निकल रहे हैं
इंसान की ………….

फ़िज़ूल खर्ची नहीं तो और क्या कहोगे इसको
अपने स्वासों की कदर ही नहीं है जिसको
खुद तो मर रहा है लेकिन औरों की मौत का सामान बनकर
इसको समझाने के तो सारे प्रयास विफल रहे हैं
इंसान की ………….

मुश्किल के इस दौर में भुला बैठा है इंसान इंसानियत को
लोगों की जान का हुआ सौदागर देखो इसकी शैतानियत को
कोई फर्क नहीं पड़ता है इसको किसी के तड़पने से
इसकी आँखों के सामने कितनों के प्राण निकल रहे हैं
इंसान की ………….

ज़िंदगी की अनजान राहों में पैसा कमाने की चाहों में
जा बैठा है इंसान आज देखो शैतान की पनाहों में
पैसे के सिवा नहीं देता है आज कुछ भी दिखाई इनको
ये तो खुद अपने आप को ही छल रहे हैं
इंसान की ………….

मैं ये भी कर लूं मैं वो भी कर लूं मन की तृष्णा तो बढ़ती हे जाए
एक तृष्णा पूरी हो तो फिर दूसरी तृष्णा पैदा हो जाए
नहीं होते हैं काम ख़त्म इसके चाहे जितना भी काम करे
काम ख़त्म करने के तो इसके सारे प्रयास विफल रहे हैं
इंसान की ………….

 

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