परिवार – कहानी हर घर की

यह एक  ऐसी कहानी है जो कहीं ना कहीं किसी ना किसी परिवार के हालातों को दर्शाती है। जहाँ परिवार में आपसी मनमुटाव होते रहते हैं । लेकिन उन सबसे ऊपर उठकर अपने परिवार को कैसे संभालें ऐसी ही शिक्षाप्रद कहानी का नाम है परिवार – कहानी हर घर की । यह कहानी है सुरेश की उसकी माँ शीला और पत्नी रेखा की । दिल को छू जाने वाली इस कहानी को शुरू करते हैं :-

गरीब परिवार के लड़के को नौकरी

सुरेश अभी अभी कॉलेज से निकला ही था कि उसको एक बड़ी सी MNC कंपनी में नौकरी मिल गई।
उसके  के पिताजी को देहान्त सुरेश की 2 साल की उम्र में हो चुका था ।
सुरेश को केवल उसकी मां ने ही पाला पोसा था। बस यही उसका परिवार था।

अब उसकी मां की खुशी का ठिकाना नहीं था।
आखिर उसकी बरसों के अथक परिश्रम का फल आज उसको प्राप्त हो चुका था।

इस खुशी के मौके पर सुरेश की मां ने सारे मोहल्ले में मिठाई बांटी ।
सुरेश की मां का नाम शीला देवी था। शीला को हर कोई बधाई दे रहा था।

सिर्फ शीला ही नहीं बल्कि सारे गांव के लिए ये गर्व की बात थी।

सारे गांव वाले इस बात से खुश थे कि सुरेश कामयाब हो गया।
अब सुरेश की गरीबी बहुत दिनों तक नहीं रुकने वाली थी।
और बहुत से गांव वालों की उधारी भी बापिस मिलने वाली थी।

उधर सुरेश भी अपनी नौकरी को लेकर बहुत उत्सुक था। उसके बहुत तो नहीं लेकिन जितने थे चुनिन्दा  दोस्त थे।वो दोस्त जो उसके दुख में भी शामिल होते थे। सुरेश ने उन्हीं दोस्तों को अपनी खुशी में शामिल किया।

नौकरी और परेशानी

सुरेश खूब मन लगाकर अपना काम करता था। लेकिन गांव  का था और चालाक भी नहीं था ।
इसका नतीजा यह हुआ कि उसका काम बढ़ने लगा। हर कोई किसी ना किसी तरीके से अपना काम उसको दे देता।
सुरेश ठहरा शराफत का पुतला। बो किसी को मना नहीं कर पाता था।
यही कारण था कि उसका काम इतना बढ़ गया कि वह  परेशान होने लगा।

उसका उत्साह और मनोबल अब कमज़ोर पड़ने लगा।
ऑफिस में पूरा दिन काम और घर में सबके फोन आते रहते।
मानो सुरेश के पास अपने लिए समय ही नहीं बचा हो।  अब बो थोड़ा मायूस रहने लगा था।
उसकी मां से उसका यह हाल देख ना गया। उसने एक दिन पूछ ही लिया।

 

माँ बेटे का वार्तालाप और सुरेश के मनोबल को बढ़ावा

शीला:- क्या बात है बेटा, आजकल उदास से रहते हो?

सुरेश:- कुछ नहीं मां में ठीक हूं।

शीला:- अरे बता भी से क्या बात है?

सुरेश:- कुछ नहीं मां बस ऑफिस की बजह से थोड़ा परेशान हूं।

शीला:- ऑफिस में ऐसा क्या हो गया?

सुरेश:- मां हर कोई अपना काम मुझे दे जाता है और मैं किसी को कुछ बोल भी नहीं पाता हूं।

शीला:- कोई बात नहीं बेटा। तुम जितना कर सकते हो कर दिया करो। और बाकी सबको मना कर दिया करो।

सुरेश:- यही तो दिक्कत है मां। मैं किसी को मना नहीं कर पाता।

शीला:- वो तो ठीक है लेकिन खुद का ध्यान भी रखो। अगर खुद परेशान रहोगे तो उस काम का क्या फायदा।

सुरेश:- क्या करून मान फिर मैं ।

शीला:- आराम से काम करो । और जितना होता है उतना ही करो। सारा दिन लगातार काम करने का कोई फायदा नहीं।

सुरेश:- ठीक है मां।

अब सुरेश को जैसे कुछ राहत मिली थी। मिलती भी क्यूं नहीं । आखिर शीला ही तो उसकी प्रेरणा का स्त्रोत थी।

अब सुरेश को भी धीरे धीरे दुनियादारी समझ आने लगी थी। उसने भी कुछ  हद तक ऑफिस वालों को हैंडल करना सीख लिया था।

रिश्ते की बात

एक दिन सुरेश जब घर पहुंचा तो उसकी मां ने उसको बुलाया।

शीला:- बेटा आज का दिन कैसा रहा ?

सुरेश:- ठीक था मां।

शीला:- तेरे फूफा जी आए थे । तेरे रिश्ते की बात कर रहे थे।  अगर तुझे कोई लड़की पसंद है तो बताओ।

सुरेश:- अरे मां कैसी बातें करती हो। मुझे पढ़ाई करते समय इतना टाइम ही नहीं मिला कि मैं ये सब सोच पाऊं।

शीला:- तो फिर उस लड़की को देख लो । अगर पसं आए तो बात आगे बढ़ाते है। बहुत दिनों से तेरे फूफा जी पूछ रहे हैं।

सुरेश:- मां आप देख आओ। अगर आपको पसंद है तो ठीक है।

शीला:- नहीं बेटा । उमर तुमको बितानी है । तुम्हारी पसंद होना ज्यादा ज़रूरी है।

सुरेश:- अरे मां। आज तक कोई ग़लत चीज़ आपने मेरे लिए पसंद की है जो ये करोगे। बल्कि मेरे लिए क्या अच्छा है आपको जायदा पता है।

शीला ने सुरेश को सीने से लगा लिया । उसकी आंखों में आंसू थे। ये आंसू खुशी के थे कि उसका बेटा उसपर कितना भरोसा करता है।

खैर अगली छुट्टी के दिन शीला सुरेश उस लड़की को देखने गई। लड़की बहुत सुंदर  थी ।
उसका नाम रेखा था । उसका परिवार भी शालीन लग रहा था तो शीला को रिश्ता अच्छा लगा।
उधर सुरेश को भी लड़की पसंद आ गई। रिश्ता पक्का हुआ। कुछ समय के बाद दोनों की शादी हो गई। दोनों परिवारों में खुशी की लहर थी।

 

रेखा की मौसी का आगमन

शादी को तीन महीने बीत चुके थे । सब ठीक ठाक चल रहा था। एक दिन रेखा कर मौसी उससे मिलने आई।
शीला ने उसकी आवभक्त में कोई कमी नहीं छोड़ी। लेकिन उसके तेवर कुछ अलग ही थे।
शीला को कुछ अटपटा सा लगा। लेकिन शीला ने सोचा ये को से रोज़ रोज़ आ रही है।
यही सोचकर उसने बात को अपने दिमाग से निकाल दिया। लेकिन जबसे रेखा की मौसी उसको मिलकर गई थी उसके भी तेवर बदलने शुरू हो गए थे।

बहू का इन्कार  और सास का अकेले बाज़ार जाना

गर्मियों के दिनों की बात है। जून महीना चल रहा था । सुबह के 10:30 बज रहे थे।
घर का कुछ समान और सब्जियां वगैरह आनी थीं।

शीला ने रेखा रेखा को कहा:-

शीला:- बेटी चलो जरा बाज़ार होकर आते हैं। कुछ समान भी लेना है। दोनों चलते हैं ।
तुम भी थोड़ा घूम लोगी बाहर और मेरा भी में लगा रहेगा।

रेखा:- नहीं मां। बाहर देखो कितनी धूप है। मेरा सारा चेहरा खराब हो जाएगा। आप जा आओ।
वैसे भी आप मेरी सुंदरता के बारे में समझ नहीं पाओगे। क्यूंकि आप तो खुद सुंदर नहीं हो।

शीला को बहुत अटपटा सा लगा। खैर बो जाने के लिए तैयार होने लगी। जैसे ही वो घर से निकलने लगी रेखा ने उसको आवाज़ दी।

रेखा:- मां!

शीला:- हां बेटी कहो ।

रेखा :- मेरे लिए यह क्रीम लेते आना।

रेखा ने क्रीम का नाम लिखकर शीला को पकड़ा दिया। शीला उसको लेकर चल पड़ी। शीला पैदल बाज़ार की ओर निकल पड़ती है।

पैसे बचाने के चक्कर में शीला पैदल ही जाती है। पैसे  बचाने की उसकी पुरानी आदत थी।

वो बाज़ार में पहुंचती है। पहले को अपनी बहू के लिए क्रीम खरीदने का फैसला करती है। शीला कॉस्मेटिक की दुकान पर पहुंचती है ।

 

बहू के लिए क्रीम की खरीददारी

शीला रेखा द्वारा दी गई पर्ची को दुकानदार को पकड़ाते हुए:-

शीला:- भैया ! ये दे देना।

दुकानदार:- अरे आओ बहनजी! कैसे हो?

शीला:- ठीक हूं भैया।

दुकानदार:- बहनजी ! एक और क्रीम आई है नई। उसका दाम भी इससे बहुत कम है।

शीला:- लेकिन मुझसे तो यही मंगवाई है बहू ने।

दुकानदार:- ये सस्ती वाली ले जाओ। अच्छी है। बहू एक बार लगाएगी तो उस महंगी क्रीम को भूल जाएगी।

शीला :- ठीक है भैया ! देदो फिर।

दुकानदार से क्रीम लेकर उसको पैसे दे देती है।

अब शीला सब्जी वाले के पास जाती है। सब्जी वाले से सब्जी खरीदती है ।

अब वो किराने की दुकान की तरफ रवाना हो जाती है।

किराने वाले के पहले के भी कुछ पैसे बचे हुए थे। उसने समान डलवाया।

 

शीला को दुकानदार की सलाह

दुकानदार:- बहनजी और बताओ सुरेश कैसा है?

शीला:- ठीक है भैया आपकी दुआ से ।

दुकानदार:- और बहू वो तो ठीक रहती है? सुना है उसकी मौसी आयी थी।

शीला :- बहू भी ठीक है। हां आई तो थी एक दिन।

दुकानदार:- बहनजी! जरा संभालकर रखना बहू को उससे।

शीला:- क्यूं क्या हुआ?

दुकानदार:- उसका ससुराल मेरी मौसी के पड़ोस में ही है। पूरे मोहल्ले में झगड़े पड़वा रखे हैं उसने।

शीला:- तो भैया पहले क्यूं नहीं बताया? हम रिश्ता ही नहीं करते।

दुकानदार:- अरे बहनजी! अब इसमें आपकी बहू की क्या ग़लती? बो तो बहुत अच्छी है।

आप कहीं ऐसा ना करो इसलिए ही तो बताया नहीं। और वैसे भी आपको उससे क्या लेना? बहू ठीक होनी चाहिए।

बस उसको थोड़ा बहू से दूर रखना। पता चला उसकी बातों में आकर अपना नुकसान कर बैठे।

 

उसकी बातों में तर्क तो था |

शीला:- हां भैया! ये तो ठीक कहा तुमने| चलो अब ध्यान रखूंगी|

अब ये बताओ कितने पैसे हुए?

दुकानदार:- पैसे कौन सा भागे जा रहे हैं? 2 000 ही हुए हैं| बाद में दे देना अगर नहीं है तो|

शीला :- नहीं भाई! बो बात नहीं है| ये लो 3000 काट लो|

दुकानदार:- अरे 2000 ही हुए|

शीला:- लेकिन 1000 पिछले भी रहते हैं ना|

दुकानदार:- बहनजी! सच बोलूं तो मुझे तो याद भी नहीं था|

शीला:- लेकिन मैंने तो देने थे। इसलिए मुझे याद था।

दुकानदार:- इसलिए तो आपके पैसे लिखता नहीं कभी।

आप खुद ही दे देते हो।

शीला:- चलो भैया आपकी मर्ज़ी| अच्छा अब चलती हूं|

दुकानदार:- अरे धनिया! बहनजी का समान गाड़ी में रखो और घर छोड़ आओ|

धनिया :- ठीक है ।

 

बहां  पर काम करने वाले व्यक्ति का नाम धनिया था  और रिक्शा भी चलता था|

धनिया समान रिक्शा में रखता है और शीला को उसमें बिठाकर चल पड़ता है|

 

घर पहुंचकर शीला सारा समान रखवाती है। धनिया को चाय पिलाकर पैसे देती है | अब धनिया बहां से चला जाता है|

बहू का सास पर ताना मारना और उसे बदसूरत कहना

इतनी देर में रेखा की भी नींद खुल जाती है| बो भी बाहर आती है| आते ही बो शीला से पूछती है:-

रेखा:- मांजी ! मेरी क्रीम ले आए?

शीला:- हां बेटी! ये लो|

ये कहकर शीला क्रीम का पैकेट निकालकर रेखा को देती  है।

रेखा:- लेकिन जो मैंने मंगवाई थी ये वी नहीं है।  ये तो कोई और है।

शीला:- हां बेटी! दुकानदार ने कहा ये उससे अच्छी है और सस्ती भी थी। इसलिए ये ले अयी।

रेखा :- अरे मांजी आप खुद तो सुंदर हो नहीं | आप क्या चाहते हो , मैं भी आपकी तरह हो जाऊं?

शीला :- अरे बेटी ! कैसी बात कर रही हो? क्या हुआ अगर मैं सुंदर नहीं हूँ तो | मैं भला तुम्हे क्यूँ बदसूरत बनाने लगी ?

रेखा अगर ऐसा नहीं होता तो आप वही क्रीम लातीं | आप क्या समझोगे गोरे रंग को |

शीला के सब्र के  बांध का टूटना

इस बार शीला के चेहरे पर गुस्सा था और उसकी आँखें भर आयीं थीं |

शीला :- बहू तुम सुंदर हो अच्छी बात है | लेकिन इस रंग पर इतना गुरूर  अच्छा  नहीं होता | जो सुंदर नहीं होते वो क्या इंसान नहीं होते?

और रही बात इस क्रीम की तो चाहे फेंक दो इसको| दुकानदार ने कहा था बस एक बार लगा कर देख ले |

मैं तो इसलिए ले आई थी कि अच्छी  भी है और सस्ती  भी |

रेखा :- हाँ इसिलिये कि सस्ती है | अब मुझे समझ आया कि मेरी मौसी ठीक कह रही थी |

शीला :- क्या कह रही थी तुम्हारी मौसी?

रेखा :- यही कि आप मेरी सुंदरता से जलती हो?

शीला :- ओह तो ये बात है !

रेखा :- हाँ यही बात है?

सास के दिल को ठेस

शीला :- मुझे लगा ही था कि कुछ तो बात है, जो तुम्हारे हाव भाव बदले हुए हैं|

लेकिन मुझे गुस्सा उससे नहीं गिला तुमसे है | इतने दिनों से तुम यहाँ हो, लेकिन आज तक मुझे समझ नहीं पाई|

इतना बोलकर शीला की अश्रुधारा बह निकली और वो रोते हुए अंदर चली गयी |

अब रेखा को भी लगने लगा कि उसने कुछ ज्यादा ही बुरे तरीके से बात कर ली | खैर! वो अपने रूम में चली गयी | सास बही की पूरा  दिन कोई बात नहीं हुई |

शाम को सुरेश जब घर बापिस लौटा तो बहुत थका हुआ था | आकर उसने हाथ मुंह धोए | रेखा ने उसे पानी पिलाया |

सुरेश :- रेखा! मां कहाँ है ?

रेखा :- वो अंदर खाना बना रहे हैं|

सुरेश :- थोड़ा नाराज़ होते हुए , तुमने क्यूँ नहीं बनाया? अब भी मां ही सारे काम करेगी तो हमारा क्या फायदा ?

 

रेखा का मन ही मन डरना

अब रेखा को थोडा डर लगने लगा | उसने सोचा कि अब अगर मां ने दिन की बात बता दी तो क्या होगा?

सुरेश:- क्या सोच रही हो? मां ओ मां ! कहाँ हो आओ यहाँ आओ |

मां रसोई से बहार आते हुए

शीला :- हाँ बेटा कहो क्या हुआ ?

सुरेश :- कुछ नहीं | तुम खाना क्यूँ बना रही हो? रेखा बना देती |

शीला :- नहीं बेटा ! वो बात नहीं है| मैंने सोचा आज मैं खाना बना लेती हूँ | इसलिए बना रही थी |

सुरेश :- चलो फिर कोई बात नहीं |

सभी खाना खाते हैं| अपने अपने कमरे में सोने चले जाते हैं|

सुरेश भी मां और रेखा दोनों को देखकर समझ चुका था | उसे ये अंदेशा हो गया कि आज कुछ तो ज़रूर हुआ है इन दोनों के बीच |

दिन में घटित घटनाक्रम का सुरेश द्वारा पता लगाना

सोते समय सुरेश रेखा को पूछता है:-

सुरेश:-  रेखा! क्या बात है ?मां कुछ मायूस सी लग रही है आज।

रेखा:- कुछ नहीं बस ऐसे ही।

सुरेश :- बताओ तो क्या हुआ?

रेखा:- मैंने मां जी से क्रीम मंगवाई थी। लेकिन वो दूसरी ले आईं। जब मैंने कहा तो नाराज़ हो गई।

सुरेश:- अच्छा ! चलो कोई बात नहीं । आओ मां से बात करते हैं।

रेखा:- लेकिन!!!!

सुरेश:- लेकिन क्या?

रेखा:- में उनसे क्या बात करूंगी?

आप कर लो।

सुरेश:- अरे चलो भी! एक दूसरे से रूठने से बेहतर है बात की जाए।

रेखा:- चलो ठीक है।

रेखा सुरेश के साथ शीला के कमरे की तरफ चल पड़ती है।

सुरेश भी यह सोच रहा था कि इस बात को कैसे खत्म करना है।

पूरे परिवार का आपस में वार्तालाप

दोनों शीला के रूम में पहुंचते हैं।

शीला:- क्या हुआ बेटा?

सुरेश:- कुछ नहीं मां। बस आप उदास से थे तो सोचा थोड़ी बातें करते हैं।

शीला:- अच्छा। आ जाओ, बैठो।

सुरेश:- मां क्या हुआ ?

शीला:- कुछ भी तो नहीं।

सुरेश:- तो फिर।

शीला:- अरे नहीं बेटा बस ऐसे ही।

सुरेश:- ठीक है माँ मत बताओ | रेखा तुम बताओ |

शीला:-  अरे नहीं नहीं बेटा |

रेखा सुरेश को बात बताने लगती है |

रेखा:- मैंने मां जी से क्रीम मंगवाई थी। लेकिन वो दूसरी ले आईं। जब मैंने कहा तो नाराज़ हो गई।

इसके बाद तो जैसे शीला की सब्र का बाँध टूट ही जाता है |

वो  बोलने लगती है

शीला :- अरे रहने दो बहु | मैं बदसूरत हूँ ना , इतना ही काफी है |  लेकिन मैं तुम्हारी ख़ूबसूरती खराब नहीं करना चाहती |

इसके बाद शीला सुरेश को पूरी बात बताती है |

 

अपने परिवार को सुरेश द्वारा समझाना

सुरेश शीला को जैसे तैसे चुप करवाता है |

सुरेश :- रेखा! अगर माँ कोई और क्रीम ले भी आई थी तो तुम उसे चाहे ना लगाती |  पर मुझे ये बताओ कि तुमने बदसूरत क्यूँ बोला ?

तुमने माँ को ज़लील क्यूँ किया?

और तुम्हे अपने गोर रंग पर इतना घमंड क्यूँ है ?

फिर तुम्हारी नज़र में तो मैं और तुम्हारा मायका परिवार भी बदसूरत हुआ|

देखो रेखा ! ख़ूबसूरती इंसान के चेहरे से नहीं उसके दिल से होती है | और तुम्हारे दिल में इतनी गंदगी भरी है मैंने कभी सोचा भी नहीं |

शीला :- अरे नहीं बेटा! ऐसा नहीं कहते | बहु सबकुछ छोड़ कर हमारे पास आई है |

खबरदार मेरी बहु को कुछ भी ऐसा कहा तो|  मैं तो पता नहीं कब तक रहूंगी | लेकिन ऐसा कभी मत करना दोबारा |

तुम दोनों को ज़िन्दगी साथ बितानी है |

गलती का एहसास

रेखा को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था | बो अब सब कुछ समझ चुकी थी |  वो रोते हुए शीला के पैरों में गिर पड़ती है  और माफ़ी मांगने लगती है |

रेखा:- माँ मुझे माफ़ कर दो | मैं बहकावे में आ गयी थी |

शीला:- अरे बेटी उठो! ऐसा नहीं करते |

रेखा को  उठाकर शीला गले से लगा लेती है |

शीला:- मुझे पता है  बेटी ! दुकानदार ने तुम्हारी मौसी के बारे में बताया था आज |

लेकिन तुम हमेशा ध्यान रखना | किसी की बातों में आकर अपना नुक्सान ना कर बैठना |

कहते भी है कि सुनो जन की और करो मन की |

रेखा :- जी मांजी | अब आपको कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगी |

और फिर दोनों सास बहु एक दूसरे के गले लगकर रोने लगती हैं |

यह दृश्य देखकर सुरेश की भी आँखें भर आयीं|

बहू का अपने पति और सास के प्रति आभार व्यक्त करना

रेखा:- मैं आपका आभार कैसे व्यक्त करूँ | काश दुनिया की हर लडकी को आपके जैसा पती मिले और मेरी सासुमाँ  सी सास | दुनिया में हर परिवार खुशहाल हो जाएगा |

और आपका भी धन्यवाद माँ | आपने इनको भड़काया होता तो पता नहीं क्या हो जाता | आपने इतना कुछ होने की बाद भी मेरी गलती पर पर्दा डाला और मेरा ही पक्ष लिया |

शीला:- अरे बहु ! सुरेश मेरा बेटा है | किसी के बहकावे में नहीं आता | तभी तो सब ठीक कर दिया |

और तुम भी तो कम नहीं हो | अपनी गलती को मानना बहुत बड़ी बात है| भगवान् तुम्हारे जैसी बहु सबको दे |

 

अन्त में

अब सब कुछ ठीक हो चुका था | दूरे दिन से सब नार्मल हो गया | रेखा ने वो क्रीम लगाई | वो अच्छी थी | रेखा अब समझ चुकी थी कि हर महंगी चीज़ ही अच्छी हो ये ज़रूरी नहीं |

लेकिन अब रेखा ने समझदारी दिखाई और अपनी मौसी दूर हो गई| वो अब समझ चुकी थी कि मौसी से दूर रहने में ही भलाई है | वरना उसका हंसता वसता  संसार उजड़ जाएगा |

तो दोस्तो ! कैसा होगा अगर हर परिवार में शीला जैसी माँ, सुरेश जैसा बेटा और रेखा जैसी बहु होगी तो |

मेरे ख्याल से तो उस परिवार को कोई चाह कर भी नहीं तोड़ पायेगा |

 

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धन्यवाद 

 

 

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R.K.Jaswal

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