लड़की – एक संघर्ष समाज के साथ

एक लड़की कहें या एक संघर्ष समाज के साथ ; मन के पार पर एक ऐसी या यूं कहें लगभग हर लड़की के दिल का दर्द वयान करती अनोखी कहानी को पढ़ते हैं

रजनी एक साधारण सी लड़की  थी। वो एक  MNC कंपनी में काम करती थी।
हर रोज़  की भांति वो आज भी  ऑफिस के लिए  तैयार हो चुकी थी ।
वो  ऑफिस के लिए निकलने ही वाली थी कि उसकी दादी ने कहा :-

दादी:- अरे रजनी बेटा! आज मेरा चश्मा लेती आना जो बनवाने को दिया है।

रजनी:- ठीक है दादी! मैं के आऊंगी।

और फिर रजनी अपने ऑफिस की तरफ निकल पड़ी ।

 

लेख सूचि

  1. बस स्टॉप पर लड़कियों की दशा
  2. बस के अन्दर लड़कियों से बर्ताव
  3. ऑफिस में लड़कियों के प्रति नजरिया
  4. लड़की के लिए लोगों की नज़रों में वासना
  5. जातिवाद का सामना करती लडकियां
  6. दूसरों का ख्याल रखते रखते खुद को भूल जाने वाली शख्सियत
  7. कहानी का सार / अभिप्राय

 

बस स्टॉप पर

अभी बस आने में लगभग दस मिनट शेष थे।
लेकिन ये दस मिनट उसके लिए बहुत कठिन होने वाले थे।
यहाँ खड़े लड़के तो जैसे इसी ताक में थे कि कोई लड़की आए।

रोज की भान्ति taunting शुरू हो चुकी थी।
रजनी बस सर झुकाकर सबकुछ सुनकर भी अनसुना करने की कोशिश कर रही थी।
बस वो यही सोच रही थी कि न जाने कब लोगों की सोच बदलेगी।

इतने में बस आ गई । उसके शरीर को टटोलती हुई नज़रों को वो साफ़ महसूस कर सकती थी ।

तभी रजनी को एहसास हुआ कि कोई उसको छू रहा है।
अब रजनी की बर्दाश्त से बहार हो गया।
उसने पीछे मुड़कर उस लड़के का हाथ पकड़ा और उसको एक थप्पड़ लगा दिया।

बस बहाँ भीड़ इक्कठी होने में देर नहीं लगी। खैर किसी ने पास खड़े पुलिस वाले को बुला दिया।
पुलिस वाले ने आते ही भीड़ को भगा दिया । फिर रजनी ने उसे सारी बात बताई ।

लेकिन ये क्या ? उस पुलिस वाले की नज़रें उसे और भी ज्यादा खा जाने वालीं थीं।
यह सब देख कर रजनी डर गई। उधर उस लड़के ने पुलिस वाले को चुपके से कुछ नोट पकड़ाए जो रानी ने देख लिया।

पुलिस वाले ने झूठ मूठ का लड़के को धमकाया और रजनी को समझाने लगा कि कंप्लेंट करके कोई फायदा नहीं है।
रजनी को सब समझ आ चुका था। वो चुपचाप दूसरी बस में बैठ कर चल दी।

 

बस में

बस में भी बही रोज़ का नाटक था।
पीछे बैठा व्यक्ति जो उसके बाप की उम्र का था ।
वो उसके बालों के साथ खेल रहा था।

रजनी ने पीछे मुड़कर उसको घूरा तो वो बेशर्मों की तरह दांत दिखने लग पड़ा।
उसके गुटखे से भरे हुए गंदे दांत देखकर रजनी को घिन सी आ गई।

इतने में कंडक्टर आ गया। रजनी ने पैसे दिए और अपने स्टेशन का नाम बताया।
कंडक्टर ने बकाया और टिकट देते समय रजनी के हाथ को हल्का सा दबा दिया।

रजनी ने उसको घूर कर देखा तो बो चुपचाप चला गया।
अपने स्टॉप पर पहुंचकर रजनी ऑफिस में पहुँच गयी।

ऑफिस में 

 रजनी जैसे ही अपनी कुर्सी पर बैठती है कि, उसका एक सहकर्मी आ जाता है। उसका नाम राघव था।

राघव:- हैलो मैडम! कैसे हो?

रजनी:- हैलो! ठीक हूं राघव आप सुनाओ ।

राघव:- मैं भी ठीक हूं।

रजनी:- और क्या चल रहा है आपके प्लांट में? सुना है M D सर नाराज़ है रहे थे।

राघव:- हां मैडम । उसी सिलसिले में बात करनी थी।

रजनी:- हां हां बताओ।

राघव:- मैडम मेरे प्लांट से लड़कियों को हटा दो।

रजनी:- (हैरान होते हुए )अरे! ये क्या बोल रहे हो?

राघव:- हां मैडम । लड़कियों की वजह से मेरे प्लांट की progress बहुत कम आ रही है।

रजनी:- बो कैसे?

राघव:- मैडम! ना तो लड़कियां बजन उठाती हैं और ना ही काम करती हैं।

रजनी:- अरे! अगर काम नहीं करतीं हैं तो उनकी salary में इतना ज्यादा increment लगाने की सिफारिश क्यों की?

और अगर वो वजन नहीं उठा पाती हैं तो उनसे वो काम लेलो जो वो कर सकती हैं।

आप मैनेजर हो। आपको यही सब तो मैनेज करना है। जिसमें जैसा टैलेंट है उससे वैसा काम लो। और जो नहीं करता उसके लिए कोई जायज़ कदम उठाओ।

ऑफ़िस से जुड़ी एक और कहानी को पढ़ने के लिए यहाँ click करें:- मैं घर और ऑफिस

राघव:- मैडम ! ये तो कोई बात नहीं हुई।

रजनी:- क्यों ? अब कोई भारी सामान नहीं उठा पा रहा है उसके लिए उसे नौकरी से तो नहीं निकाल सकती मैं।

राघव:- मैं ये नहीं कह रहा हूं। मैं ये बोल रहा हूं कि मेरे प्लांट से हटाकर जोधपुर बाले प्लांट में डाल दो।

रजनी:- देखो राघव ऐसा नहीं हो सकता। आपके प्लांट में मैंने पहले ही बहुत काम लड़कियां दे रखी हैं।

राघव:- तो इसका मतलब आप बस यहां बैठने के लिए हो? कर कुछ भी नहीं सकते?

रजनी:- नहीं। वही कर सकती हूं जो जायज़ है। और मैं जो करती हूं हो मेरे seniors को पता है। मुझे आपको बताने की ज़रूरत नहीं है।(इस बार रजनी की आवाज़ में थोड़ा गुस्सा था)

राघव भी वहां से पैर पटकता हुआ चला गया।

राघव के जाने के बाद रजनी ने सर को झटकते हुए खुद को सामान्य करने की कोशिश करी।

जैसे ही रजनी की नजर घड़ी पर  पड़ी वो जल्दी से files ढूंडने लगी। आज उसकी मीटिंग एक row material सप्लाई करने वाली कम्पनी से थी।

उसने जल्दी से अपनी फाइल तैयार की और निकाल पड़ी।

मीटिंग हॉल में जाकर उसने अपनी सीट ली। उस

row material सप्लाई करने वाली कम्पनी का एग्जिक्यूटिव बैठा हुआ था।

 

लड़की पर लोगों की नज़रें

मीटिंग स्टार्ट हुई। उस व्यक्ति ने अपनी presentation से समझना शुरू किया। थोड़ी देर बाद जब रजनी ने गौर किया तो पाया कि वो व्यक्ति बार बार उसके गले के अंदर झांकने की कोशिश कर रहा था।

ये तो गनीमत था कि रजनी दुपट्टा लेकर बैठी थी और खुद को कवर भी कर रखा था। उसका मन कर रहा था कि उस व्यक्ति को दो चांटे लगाकर भगा दे। लेकिन क्या करती? नौकरी थी ना तो कुछ बोल नहीं पाई। बस खुद को और ज्यादा समेट कर बैठ गई।

Presentation खत्म होने पर रजनी उससे बात करने लगी।

 

रजनी:- आपकी presentation अच्छी थी।

व्यक्ति:- धन्यवाद मैडम। अब डील भी फाइनल कर दो।

रजनी:- मैं आपकी फाइल आगे भेज रही हूं। कंपनी का जो भी फैसला होगा आपको मेल आ जाएगा।

व्यक्ति:- आप काम करवा दीजिए आपके चाय पानी का ख्याल हम रखेंगे ।

रजनी:- इसकी कोई जरूरत नहीं है।

इतना बोलकर रजनी वहां से निकल पड़ती है। ऑफिस पहुंचकर उस व्यक्ति की फाइल को reviews देने लगती है।

इस काम को पूरा करके फाइल बॉस के केबिन में भेज देती है।

उसे बहुत तेज़ प्यास लगी थी। उसने अपने बैग से पानी के बोतल निकाली और पानी पीती है। इतने में उसकी एक बैचमेट आ जाती है।

 

जातिवाद

रजनी:-  अरे आओ सुरभी कैसी हो।

सुरभी:- ठीक हूं यार तुम बताओ तुम कैसी हो।

रजनी:- में भी ठीक हूं। और तुम्हारे घर के नजदीक जाने वाले प्लान का क्या हुआ?

सुरभी:- अरे क्या बताऊं यार, मेरा पक्का था। लेकिन  तुम SC  वाले मेरी सीट ले गए।

रजनी:- अरे भई SC वाले कैसे ले गए? और इसमें मैं कहां से आ गई?

सुरभी:- और नहीं तो क्या यार मेरे से एक नंबर ज्यादा लेकर तुम्हारा SC वाला ले गया।

रजनी:- अरे ! तो उसने तुमसे ज्यादा मेहनत की है । तुमको उससे परेशानी क्यों है?

तुम अपनी सोच बदलो और हमेशा दूसरों को ब्लेम करना छोड़ो।

सुरभी को अपनी ग़लती का एहसास हो चुका था। इसलिए उसने बात को बदलते हुए कहा

सुरभी:- अच्छा चल छोड़ वो सब बातें । देख छुट्टी का टाइम हो गया। चल घर चलते हैं में तुमको छोड़ देती हूं।

रजनी:- रहने दे यार! तुम्हारी गाड़ी गंदी हो जाएगी। मैं एक SC हूं ना ।

सुरभी:- अरे बाबा! माफ़ करदो । चलो अब।

दोनों लडकियां घर के लिए निकल पड़ती हैं।

रास्ते में रजनी दादी का चश्मा लेती है और घर पहुंच जाती है।

 

अपना ख्याल

रजनी:- (नहाकर आती है और दादी को चश्मा देती है) ये लो दादी अपना चश्मा।

दादी:- खुश रहो बेटा। ये बताओ इतनी थकी थकी क्यों हो?

रजनी:- कुछ नहीं दादी बस ऐसे ही।

दादी:- कुछ नहीं की बच्ची ! ये बता लंच किया था या नहीं।

रजनी को याद आता है कि उसने तो आज लंच किया ही नहीं।

रजनी:- नहीं दादी । भूल गई।

दादी:- अरे बेटा ! अपना ख्याल रखा कर । खुद ठीक रहेगी तभी काम कर पाएगी। कोई साथ नहीं देगा अगर सेहत साथ नहीं हो तो।

रजनी:- (दादी के गले लगते हुए) ओके दादी मां! अब ध्यान रखूंगी।

 

रजनी खाना खाकर अपने बिस्तर पर सोने जाती है।

जैसे ही वह लेटती है सारे दिन का घटनाक्रम उसकी आंखों के सामने आ जाता है।

 

और वो सोचने लगती है:-

  1. क्या कभी हम लड़कियां खुद को सेफ फील कर पाएंगी?
  2. क्या कभी समाज एक लड़की या औरत  इज्जत करेगा?
  3. इस  समाज का हमारे प्रति दृष्टिकोण बदलेगा?
  4. क्या ये जातिवादऊंच, नीच कभी खत्म होगा?
  5. हम भी  कभी  समानता के अधिकार से जी पाएंगे क्या?

ये सब सोचते वो लड़की (रजनी) गहरी नींद के आगोश में चली जाती है। इस उम्मीद के साथ कि शायद आने वाला कल बेहतर हो।

 

कहानी का अभिप्राय

लड़की कहानी के अन्त में मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि:-

अब ये हमें भी सोचना है कि हम क्या कर रहे हैं?

हमें चाहिए कि हम वही इज्जत हर औरत को दें;  जो हम अपनी मां, बहन, बेटी और पत्नी के लिए चाहते हैं।

इस ऊंच नीच की घटिया सोच से ऊपर उठकर इन्सान बनें।

कभी किसी को हमारी वजह से कोई तकलीफ़ ना पहुंचे।

सभी को एक समान समझें और सभी का समान आदर करें।

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Priya Bhatiya

मैं Priya Bhatiya जम्मू की रहने वाली हूँ। मुझे शेर - ओ - शायरी, गज़लें और कवितायें लिखना और पढ़ना दोनों बहुत पसंद हैं। फिर मुझे Man Ke Par website net पर मिली । अब मैं अपनी लिखी हुई रचनाएँ मन के पर वैबसाइट के माध्यम से लोगों तक पहुंचा सकती हूँ । धन्यवाद

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