हिन्दू मुस्लमान

कोई कहे हिन्दू कोई कहे मुस्लमान

हिन्दू मुस्लमान

कोई कहे हिन्दू कोई कहे मुस्लमान ,
इस जग मैं मिला नहीं ऐसा जो कहें ऐसा ,
मैं हूँ इन्सान ,
जब बनी ये दुनिया तब बना इन्सान ,
फिर कहाँ से आया  ,ये हिन्दू ,कहाँ से आया मुस्लमान ,
बनाने बाले ने तो बनाया था ,बस इक इन्सान ,
इन्सान ने बनाया .ये मजहब ,ये जाती ,
भगबान ने तो बनाया बस इक इन्सान ,

बस इक इन्सान ,

इस माली ने बनायी बगिया ,
खिलाया ये गुलिस्तान ,
इसने कब सोचा था ,इन्सान ही लेगा इन्सान की जान ,
इन्सान हुआ खुदगर्ज ,खुदगर्जी की भी अब हद हुयी ,
मंदिर ,मस्जिद ,देबआल्या ,तो अब दुकानदारी सी हुयी ,
धर्म के इन ठेकेदारों  ने चक्र  ऐसा चलाया है ,
इन्सान को कर भर्मित अपना जाल बिसाया है ,
ले कर नाम धर्म का इन्सान को इन्सान से लड़ाया है ,
उठा कर देख धर्म गरंथ ओ इन्सान ,

उन मैं तो बस प्यार ही प्यार सिखाया है ,
सुन ओ इन्सान बात मैं इक बताता  हूँ ,
बंद करो यों लड़ना मजहब के नाम पर ,
राह इक दिखाता हूँ ,
इक को मनो इक को जानो इक हो जायोगे ,
अगर बात सुनोगे इन ठेकेदारों  की तो बहुत तुम पस्ताओगे ,
संगत कर लो तुम संत जनों की ,
मन मांगी मुराद पावोगे मुक्ति मिलेगी इस माया से ,
अपने निज घर बापिस जाओगे ,

 

यह भी पढ़ें :-

  1. इन्सान की फ़ितरत
  2. लड़की -1 
  3. इसका नाम है प्यार 
  4. पुराना ज़माना 

 

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2 comments

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    Bahut Khoob farmaya jnab.

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    bas aisi soch chahiye

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