Kali Zuban – काली ज़ुबान

हमने अक्सर अपने जीवन में काली ज़ुबान के बारे में कभी ना ज़रूर सुना होगा। कभी किसी को कहते हुए  सुना होगा या फिर खुद कहा होगा ।अक्सर ऐसा होता है कि किसी समय कोई व्यक्ति हमें कोई सलाह देता है। उस सलाह के साथ साथ फैक्ट्स भी बताता है। अर्थात उस काम के फायदे और नुक्सान।

अब अगर कहीं उसके द्वारा कही गई नुक्सान की बात सच है जाए, तो क्या कहा जाएगा?

सब यही कहते हैं कि उस फलां आदमी या औरत की ज़ुबान काली है। उसने ये कहा था और देखो ऐसा ही हो गया। फिर उस इन्सान से हम दूर रहने का प्रयास करते हैं। ऐसी ही एक कहानी है कमला की।

 

कमला एक बहुत ही पिछड़े हुए गांव में रहती थी। वो थोड़ी पढ़ी लिखी भी थी। उसके पति का नाम गुरदयाल था। वो गांव में अपनी खेती और मज़दूरी करके वो अपना घर चलाते थे।

अब आपको तो पता ही होगा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में बली प्रथा है। ऐसा ही इस गांव में भी था। यहां भी हर फसल पर कुलदेवता को बली दी जाती थी।

इस बार फसल भी अच्छी हुई थी । गांव के लोगों में वैसे ही बहुत उत्साह था। सभी गांव वाले बहुत उत्साह के साथ बली की तयारी कर रहे थे। इस बार बली के लिए बकरा देने की बरी  सुखिया की थी।

सुखिया वैसे तो संपन्न व्यक्ति था परन्तु, बहुत लालची और धूर्त भी था। बली बाले दिन सभी इकट्ठे हुए मंदिर में। बली की तैयारी की गई।  सुखिया भी बकरा लेकर आ गया।

 

जब बली देने लगे तो कमला ने कहा:-

 

कमला:- इस बकरे के स्थान पर किसी और बकरे की बली देनी चाहिए।

मुखिया:- क्यूं कमला ऐसा क्यूं बोल रही हो?

कमला:- यह बकरा ठीक नहीं लग रहा। ऐसा लग रहा है जैसे इसको कोई बीमारी है।

सुखिया:- अरे कमला! ये क्या बोल रही हो? मेरा बकरा बिल्कुल तंदरुस्त है। देखो मुखिया जी यह झूठ बोल रही है।

 

कमला:- में क्यूं झूठ बोलने लगी भला। मुझे जो लगा मैंने बोल दिया। मैंने इसलिए बोला के बीमार बकरे का मांस खाकर कोई बीमार ना पड़े।

 

सुखिया:- ये क्या बोल रही हो कमला! शुभ शुभ बोलो। तुम क्या अपने गांव की खुशी नहीं चाहती, हो ऐसे शुभ अवसर पर अशुभ बातें कर रही हो।

 

कमला:- भला चाहती हूं तभी तो बोला।

मुखिया:- चलो छोड़ो दोनों आपस में झगड़ना।  सुखिया कुआ तुम सच बोल रहे हो कि बकरा तंदरुस्त है?

सुखिया:- बिल्कुल मुखिया जी। बकरा बिल्कुल ठीक है।

मुखिया चलो फिर बली की रस्म पूरी की जाए।

 

उसके बाद बकरे की बली दी जाती है। बकरे का मांस प्रसाद के रूप में सभी में बांटा जाता है। कमला प्रसाद लेने से इन्कार कर देती है।

सभी इस बात को बुरा मनाते हैं। मुखिया भी इस बात से नाराज़ था।

इसके बाद सब अपने अपने घरों की तरफ निकल पड़ते हैं।

घर पहुंचकर कमला का पति गुरदयाल उससे बात करता है

 

गुरदयाल:- आज ठीक नहीं हुआ मंदिर में कमला।

कमला:- क्यों, क्या ग़लत किया मैने?

गुरदयाल:- अरे क्या ज़रूरत थी इतना बखेड़ा खड़ा करने की?

कमला:- और क्या करती? बकरा सही में बीमार था। औरों को भी बीमारी लगती तो?

गुरदयाल:- वो तो ठीक है लेकिन प्रसाद लेने से इंकार नहीं करना चाहिए था।

कमला:- देखिए मेरा आपके सिवा कोई और नहीं है। और आपको बीमार करने से बेहतर है कि मैं प्रसाद ना लूं।

गुरदयाल भी कमला के विचारों से सहमत था। इसलिए वो भी चुप हो गया। लेकिन कोई था जिसको अभी भी कमला से अत्यधिक गुस्सा था। वो था सुखिया। सुखिया अब ये सोच रहा था कि कैसे भी करके अब कमला को नीचा दिखाना है। अब इस काम के लिए उसने अपनी योजना बनानी शुरू कर दी।

 

Kali Zuban -1  के इस भाग मेन इतना ही । अब सुखिया क्या योजना बनाएगा ?

क्या वो कमला को नीचा दिखाने में सफल हो पाएगा?

कमला ने प्रसाद ना लेकर ठीक किया या ग़लत?

गुरदयाल और कमला के जीवन पर इस बली पूजा का क्या असर पड़ेगा?

 

इन सब बातों को जानने के लिए हमारे साथ जुड़े रहिए ।

जल्द ही आपके सामने इस कहानी का दूसरा भाग Kali Zuban -2  प्रस्तुत होगा।

तब तक के लिए:-

 

नमस्कार

यह भी पढ़ें :-

  1. Kali Zuban -2 (काली ज़ुबान-2)
  2. जिन्दगी में
  3. Apne
  4. Purana Zamana – पुराना ज़माना
  5. Lalach Buri Blaa Hai

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Priya Bhatiya

मैं Priya Bhatiya जम्मू की रहने वाली हूँ। मुझे शेर - ओ - शायरी, गज़लें और कवितायें लिखना और पढ़ना दोनों बहुत पसंद हैं। फिर मुझे Man Ke Par website net पर मिली । अब मैं अपनी लिखी हुई रचनाएँ मन के पर वैबसाइट के माध्यम से लोगों तक पहुंचा सकती हूँ । धन्यवाद

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