सँसार कर्म की नगरी

सँसार कर्म की नगरी

सँसार कर्म की नगरी

यह  सँसार कर्म की नगरी, सब अपना कर्म कमा रहे,

माया के हाथों हो मजबूर, अपना मूल भुला रहे,

 

जैसा कोई कर्म कमाता बैसा ही फल पाता है ,

घिर कर लाख चौरासी में यह मुड़ मुड़ जन्म भी पाता है,

 

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कर्म काण्ड कर सोचता बन्दा संसार से मुक्ति पायेगा ,

पर कभी राजा तो कभी भिखारी बन कर अपना रोल निभाएगा,

 

मेरी मेरी सदा करता रहता ,अन्त में खाली हाथ ही जाएगा,

अन्त समय पछताता है पर फिर बेला हाथ ना आएगा

 

माया का रूप है सूक्ष्म   जो नजऱ नहीं  आ पाता  है,

होकर मजबूर माया के हाथोँ, हरदम दुःख उठाता है.

 

करे ना याद ईश्वर को यह   माया के हाथो मजबूर है,

यह दुनिया है काल की नगरी रुहानियत से  दूर है,

 

मन तो काबू हो ना सके इंसान तो जोर लगाता है

मुक्ति पाने की जितनी कोशिश करता उतना ही यह भटकाता है ,

 

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हर तरफ है माया का डेरा हर तरफ इसका साया है

पर हर ज़र्रे में नूर इलाही हर किसी को नज़र ना आया है

 

कृपा करे जो सतगुरु पूरा तो जीवन सफल हो जाता है

सतगुरु की कृपा से ही बन्दा जन्म मरण से मुक्ति पाता है

 

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