कहना या सहना

खुद को ही सोचना है कि  कहना या सहना है
किसी के दिल से उतर जाना है या फिर  दिल में रहना है

कडवी बातों को तू हँस के सह जाती है
अपने अरमानों के संग घुट के तू रह जाती है
खुद का बजूद हो जाता है ख़त्म उस वक़्त
जब किसी अजनबी की पत्नी तू बन जाती है
अपना घर छोड़ के तुझे अब दूसरे घर में रहना है
खुद को ही सोचना है………..

 

सुनती है तू सबकी बातों को  अक्सर
पर तेरी बातों को तो कोई भी सुने ना
ना जाने क्या कमी है तुझमें जो
जो कोई भी साथ के लिए तुझे चुने ना
अब सोच के कब तक तुझको चुप रहना है
खुद को ही सोचना है………..

 

चेहरे पर तो तेरे हर पल मुस्कान होती है
अपने दिल के अंगारों से तू अनजान होती है
कितना अजीब लगता होगा जब सब सुनाते हैं तुझे
और हर किसी के तंज़ का केवल तूही निशान होती है
कब तक सहेगी तू जब कहने वाली तेरी ही बहना है
खुद को ही सोचना है………..

 

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मिसाल क्या दूं तेरी सहनशक्ति की
इस मासूमियत की और आत्म भक्ति की
तू तो अनजान है अपने ही आप से
तुझे खुद को ही पहचान नहीं है तेरी शक्ति की
आखिर क्यूँ इतने दर्द में भी शर्म तेरा गहना है
खुद को ही सोचना है………..

 

बैसे तो घर की इज्ज़त है तू
पर दहेज़ से सस्ती तेरी जान है
तुझे अपने पैरों में रौंदना तो
कुछ लोगों की शान है
ना जाने आखिर कब तक
तुझको यूँ ही रुन्दते रहना है
खुद को ही सोचना है………..

 

माँ है बेटी है या फिर बहना है तू जब तक
केवल सबके दिलों का गहना है तू तब तक
बहू भाभी और पत्नी जब बन जायेगी
तेरे चेहरे से शायद मुस्कान तब मिट जायेगी
क्यूँ भूल जाते हैं सब के तू भी किसी की
बेटी है किसी की बहना है
खुद को ही सोचना है………..

 

है नहीं हर घर में ऐसा यकीनन, कहीं कहीं सर का ताज़ है तू
होते हुए भी ससुराल में, करती सब पर राज़ है तू
ना केवल करती काम घर का, बल्कि कमाती बाहर आज है तू
सास ससुर की ही है तू बेटी और ननद तो जैसे तेरी बहना है
खुद को ही सोचना है………..

 

करूँ तुम सबसे विनती कर जोड़ दुनिया बालो
इस नारी को तुम सच्चे दिल से तो अपना लो
तुझसे भी है विनती मेरी ऐ नारी कर जोड़ के
अपना ही परिवार जानो तुम सबको जब आई हो एक घर छोड़ के
सभी जो इक दूसरे के भावों को दिल से समझ पाएंगे
मेरी कलम के अल्फाज़ उस दिन धन्य हो जायेंगे
हम सब को मिल जुल संग प्यार के रहना है
खुद को ही सोचना है………..

 

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