मैं, घर और ऑफिस , दर्द एक कर्मचारी का

मैं, घर और ऑफ़िस-दर्द एक कर्मचारी का

दोस्तों नमस्कार 🙏🙏🙏🙏🙏 आज मैं इस वेबसाइट (मन के पार ) पर आपके लिए एक कहानी (मैं घर और ऑफ़िस )के साथ हाज़िर हुई  हूँ l  आशा है की आपको मेरी कहानी ज़रूर पसंद आएगी l  बैसे तो ये कहानी क्या हकीकत ही है हर उस इंसान की जो नौकरी करता है l दूसरे शब्दों  में कहें तो यह दर्द है हर उस इन्सान का जो कर्मचारी है|

मैं, घर और ऑफ़िस एक नौकरी करने वाले व्यक्ति की इस कथा में उसकी दिनचर्या के बारे बताया गया है|

यहाँ बताया गया है कि कैसे दिन-भर ऑफ़िस के कामों में व्यस्त रहने के बाद शाम  को जब घर पर वापिस जाता है |

जब वो अपने परिवार को कुछ समय देना चाहता है तो क्या होता है l
यह एक ऐसी कथा है जो अधिकतर नौकरी करने वाले कर्मचारियों  से किसी न किसी रूप से संबंधित है l
तो आईये क्यूँ न इस कहानी को उसी व्यक्ति की जुबानी पढ़ा जाए!

लेख सूचि

  1. कर्मचारी के दिन की शुरुआत को दर्शाता वाक्य
  2. ऑफ़िस में दिनचर्या
  3. पर्सनल लाईफ़ सिर्फ नाम की किस प्रकार होती है एक कर्मचारी की
  4. कर्मचारी का घर भी दूसरा ऑफ़िस होता है या बनबा दिया जाता है
  5. बेचारे कर्मचारी से  निराश होता हुआ परिवार
  6. कर्मचारी के विचार और उसके मन में उमड़ते हुए सवालों का भण्डार
  7. मोरल ऑफ़ स्टोरी

दिन की शुरुआत 

आज सुबह जब मैं अपने ऑफ़िस के लिए तैयार हो रहा था मन ही मन मेरे मन में एक ख्याल आ रहा था कि,

अपने परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए धन कमाने हेतु घर से इतनी दूर आ तो गया हूँ लेकिन,
घर वालों  से बात किये हुए काफी दिन बीत चुके हैं l
सोचा की ऑफ़िस पहुँचकर बात करता हूँ आज  अपने परिवार से l
फिर मैं निकल पड़ा अपनी कर्मभूमि की तरफ l
मैं अभी ऑफ़िस के लिए निकला ही था कि  साहब का फ़ोन आ गया l

बातचीत 

मैं :- गुड मोर्निंग सर

सर:- गुड मोर्निंग l अच्छा जब ऑफ़िस पहुँच जाओ तो पिछले कल जो हमारा ग्राहक आया था उसकी रिपोर्ट तैयार करना l

मैं :- ठीक है सर l मैं ऑफ़िस पहुँचकर उसकी फाइल निकालकर आपको फ़ोन करता हूँ l

सर:- ओके l लेकिन जल्दी करना है यह काम l

मैं :- ठीक है सर l

सर:- ओके l

ऑफ़िस की दिनचर्या 

फिर फ़ोन कट जाता है l फिर मेरा पूरा रास्ता (ऑफ़िस तक ) यह सोचते तथा उसकी रूपरेखा तैयार करते हुए निकल जाता है,
कि इस काम को अच्छे से और जल्दी से किस प्रकार करना है l
ऑफ़िस पहुँचकर मैंने सर्वप्रथम उस ग्राहक की फाइल निकाली और अपने साहब को फ़ोन लगा दिया l
लेकिन ये क्या !!!! साहब ने मेरा फ़ोन काट दिया l
मैंने भी सोचा के साहब कहीं व्यस्त होंगे इसलिए मेरा फ़ोन नही उठा पा रहे हैं l
उसके बाद मैं अपने अनुभव के मुताबिक उस फाइल को बनाने में व्यस्त हो गया l
इसी दौरान मेरे साहब के सहकर्मी का फ़ोन आ गया l

मैं :- गुड मोर्निंग सर

सर:- गुड मोर्निंग l एक काम करना हमारे यहाँ  जो भी सामान खत्म हो गया है उसकी लिस्ट तैयार करनी है  l

मैं :- ठीक है सर l अभी एक रिपोर्ट पर काम कर रहा हूँ इसके पूरा होने पर करता हूँ l

सर:- अरे! नहीं नहीं, यह काम ज्यादा ज़रूरी है और सर ने तुमसे ही करवाने को कहा है l वो काम बाद में कर लेना l

मैं :- ठीक है सर l

सर:- ओके l

ऑफ़िस के बाद की ज़िंदगी (मेरी पर्सनल लाईफ़)  

इसी प्रकार सारा दिन निकल जाता है l खैर, मैं अपने सरे काम निपटा-कर घर के लिए निकल पड़ता हूँ l
आज मैं बहुत खुश था कि सारे काम खत्म हो गये और अब मैं अपने परिवार के साथ कुछ समय बिता पाऊँगा  l
यही सब सोचते सोचते मैं घर पहुँच जाता हूँ l फ्रेश होकर पत्नी के साथ बातचीत करने लगता हूँ l
पत्नी बताती है की घर वाले आपको बहुत याद कर रहे हैं और आपसे बात करना चाहते हैं l

मुझे भी अचानक याद आता है,
कि आज उनसे बात करने के लिए क्या प्लान किया था l
मैं सारी बात अपनी पत्नी को बताता हूँ और उससे कहता हूँ कि अभी बात करता हूँ l
पत्नी खुश हो जाती है और चाय बनाने के लिए रसोई में चली जाती है l
मैं भी घर बालों से बात करने के लिए फ़ोन उठता हूँ कि तभी साहब का फ़ोन आ जाता है l

 

मेरा घर या ऑफ़िस ?

मैं फ़ोन सुनने में व्यस्त हो जाता हूँ और अपना कंप्यूटर चालू करके उसपर साहब के कहे अनुसार काम करने लग पड़ता हूँ l

पत्नी चाय लेकर आती है और मुझे कंप्यूटर पर व्यस्त देखकर उसका बहुत दिनों बाद  खिला हुआ चेहरा एक बार फिर से मुरझा जाता है l
मैं अपनी पत्नी को कहता हूँ की यह काम ख़त्म कर लेता हूँ, उसके बाद बाहर घूमने चलेंगे और खाना भी बाहर ही खाएंगे l

उसके मुरझाये हुए चेहरे पर एक बार फिर से ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है l
और मैं अपने काम पर  लग जाता  हूँ l
लेकिन ये क्या ? जैसे ही काम ख़त्म हुआ एक और फ़ोन !!!!!

 

मेरी वाईफ का तन्ज़ (ताना)

अब पत्नी भी पूरी तरह से मायूस हो चुकी थी और उसने केवल इतना ही कहा कि:-

जब हर समय काम ही करना है तो ऑफ़िस जाते ही क्यूँ हो ? घर से सारा काम कर लिया करो या फिर ऑफ़िस में ही रह लिया करो  l

इतना बोल कर वो रसोई में चली जाती है और खाना बनाने लग जाती है l
कब दस बज गये कुछ पता नही चला l खैर खाना खाने के लिए पत्नी ने आवाज़ लगाई l
मैं भी हाथ धो कर खाना खाने लगा l

लेकिन ये क्या ??? बच्चे  तो वहां थे ही नहीं l जब पत्नी से पूछा तो उसने कहा कि वो सो चुके हैं l
पत्नी के इस वाक्य में गुस्सा झलक रहा था मानो बोल रहा हो कि तुम्हारे पास समय ही कहाँ है अपने परिवार के लिए ?

 

मैं खाना खाने लगा और सोचने लगा कि कभी तो इनके लिए समय होगा मेरे पास !!!
मेरी तंद्रा फ़ोन से टूटी साहब बोल रहे थे कि किसी भी तरह से आज ही वो रिपोर्ट चाहिए l
मैं भी खाना ख़त्म करके फिर से काम पर लग पड़ा l

काम ख़त्म करके फ्री हुआ तो देखा कि पत्नी भी सो चुकी है l
दीवार पर लगी घड़ी पर नज़र पड़ी तो मैं हैरान हो गया रात का एक बज रहा था l
मैंने साहब को रिपोर्ट के बारे में बताने के लिए फ़ोन किया लेकिन किसी ने उठाया नहीं शायद साहब मुझे बता कर आराम से सो गये थे l

 

मेरे विचार मेरे सवाल  :-

इस पूरे दिन के वाक्य ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि मैं आखिर मैं हूँ क्या ?
मैं एक ऐसा व्यक्तित्व हूँ जो ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम तो कर रहा है लेकिन, अपनों से कहीं दूर हुआ जा रहा हूँ l

आज भी मैं दूर बैठे मेरे माता पिता से बात नहीं कर पाया था l
मुझे यह भी पता था कल भी इसी प्रकार से वीतेगा मेरे पास मेरे अपने परिवार के लिए कोई समय नहीं होगा l

 

समय होगा तो सिर्फ ऑफ़िस के लिए l रह रह कर मेरे मन में फिर से वही प्रश्न उठ रहे थे कि :-

  1. क्या मैं अपने परिवार के साथ कभी समय बिता पाऊँगा ?
  2. कभी ऐसा होगा क्या कि मेरा काम सिर्फ ऑफ़िस में ही हो ?
  3. क्या मेरे साहब लोग कभी मेरे हालत समझ पाएंगे?
  4.  मैं भी चैन की नींद सो पाऊँगा क्या ?

 

ऐसे बहुत से ख्याल मेरे मन में घूम रहे थे l
यह ख्याल भी आ रहा था कि कितना अच्छा होता यदि ऑफ़िस का  काम ऑफ़िस में ही होता l
एक मन कर रहा था कि कल साहब से इस बारे में बात करता हूँ l

 

लेकिन एक कर्मचारी की कौन सुनता है ? उनके भी साहब  और उनके भी साहब बैठे हैं l
हो सकता है कि मुझे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया जाये l
यही सब सोचकर मैंने एक लंबी साँस ली और करवट बदलकर सो गया l

 

कहानी का निष्कर्ष (मोरल ऑफ़ स्टोरी) :- 

यदि अधिकारी चाहें तो यह सब संभव हो सकता है l
मेरा सभी अधिकारी वर्ग से अनुरोध है कि वो अपने कर्मचारियों से ऑफ़िस के समय में ही काम करवाएं,
ताकि वो भी अपने परिवार को समय दे पाएं l

आपके इतने से बदलाव का उनके जीवन पर बहुत असर पड़ेगा और वही कर्मचारी ना सिर्फ आपको पसंद करेगा,
बल्कि अधिक से अधिक काम भी कर के देगा l

यदि आप मेरी इस बात से सहमत हों तो इसे आगे ज़रूर भेजिए l
क्या पता कोई अधिकारी कर्मचारी का दर्द समझकर ऐसा करना छोड़ दे l
यदि एक भी अधिकारी ऐसा करता है तो मैं मेरी इस कथा लिखने की मेहनत को सफल समझूंगी l

 

नमस्कार 🙏🙏🙏🙏🙏

 

यह भी पढ़ें:-

7 thoughts on “मैं, घर और ऑफ़िस-दर्द एक कर्मचारी का”

  1. In today’s era, many people are struggling with this situation. I really appreciate your hard work.
    Yes i have bookmarked your site.

Comments are closed.

Scroll to Top