बच्चपन गरीब का-2

बच्चपन गरीब का

बच्चपन गरीब का एक ऐसी दास्तान को दर्शाता है की कैसे एक मासूम गरीब बच्चे का बच्चपन बीतता है |

तो आइये इस कहानी को एक गरीब बच्चे के शब्दों में पढ़ते हैं |

 

नमस्कार दोस्तो! मेरा नाम रोहन है। अभी मैं एक सरकारी कर्मचारी हूं।

मैं लखनऊ में कार्यरत हूं। कुछ दिन पहले मेरा दिल्ली जाना हुआ ।

मैं दिल्ली की नेहरू प्लेस मार्केट में गया हुआ था । वहां मार्केट में काफी भीड़ थी।

सभी आयु वर्ग के लोग  वहां  एकत्रित थे। सभी अपने अपने मुताबिक समान ढूंढ रहे थे।

कुछ खाने पीने में व्यस्त थे।

छोटे छोटे बच्चे वहां भीख भी मांग रहे थे|  सामने से एक दंपती जोड़ा आ रहा था ।

उनका एक छोटा सा बच्चा भी थे। वो बच्चा स्ट्रॉलर में था। दोनों पति पत्नी आपस में बातें कर रहे थे।

तभी वहां से एक भिखारी बच्चा गुज़रा।

बच्चपन के ख्यालों में खोना

उन  दोनों को देखकर मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गए। बचपन में जब हम उस बच्चे की उम्र के थे तो मुझे नहीं लगता हमारे माता पिता कहीं घूमने गए हों।

वो तो वैसे भी कहीं घूमने नहीं गए होंगे। जब बचपन में किसी बच्चे को खिलौनों से खेलते हुए देखते थे तो माता पिता से यही कहते थे कि हमें भी खिलौना चाहिए।

वो बेचारे किसी तरह से  वहां से ले जाते। बो भी क्या करते? उनके पास घर चलाने के पैसे मुश्किल से हो पाते थे। हमारे खिलौने कहां से लाते?

उस समय बहुत बुरा लगता था । जहां अमीरों के बच्चे अपने घर के पक्के आंगन में खेलते थे। वहां हमारा क्रीड़ा स्थल खेत होते थे। उन बच्चों के लिए पाउडर आते थे । हमारा पाउडर तो मिट्टी ही थी। लेकिन मज़े की बात ये है कि हमें कोई एलर्जी नहीं होती थी।

स्कूल लाइफ

जब  हम थोड़े बड़े हुए तो स्कूल में दाखिला करवाया गया। स्कूल घर से लगभग 2 किलोमीटर था। अमीर बच्चे तो प्राइवेट स्कूल में थे | वो गाडी में जाते थे और हम पैदल |

हमारा भी बहुत मन करता था गाड़ी में बैठने का। खैर! हम उन बच्चों को देखकर खुश होते थे। हम उनको हाथ हिलाते थे और ताली बजाते थे।

उनके पास बहुत अच्छी स्कूल की वर्दी और जूते हुआ करते थे। हमारे पास बाथरूम चप्पल होती थी।

हमारा भी बहुत मन करता था कि उनके जैसे जूते पहने। उनकी तरह वर्दी  हो। लेकिन क्या कर सकते थे? गरीब थे ना! हर बात पर में मसोस कर रह जाते थे।

बच्चपन का मेला

एक बार मेले में जाना था। तो पिताजी से पैसे मांग बैठा।

पिताजी के पास मुझे देने के लिए 10 रुपए भी नहीं थे। आप सोच सकते हो मेरे मन की हालत था क्या होगी।

खैर! रोता रहा । खुद ही चुप हुआ। रात को खाना खाया और सो गया। अगले दिन सभी अपने खिलौने दिखा रहे थे। मैं क्या करता? मैंने भी फेंकना शुरू कर दिया।

अरे गौरव! यार कल ना जलेबी और पकौड़े बहुत खा लिए। रात को पेट में दर्द हो रहा था।  फिर मैंने एक बड़ी बंदूक खरीदी। पता है वो 700 रुपए की थी। तभी दूसरा दोस्त अमन आ गया:-

अमन:- नहीं रोहन ! वो तो 850 रुपए की थी। मैंने भी खरीदी है।

मैं:- अरे अमन! तुमको उसने ठग लिया। मैंने 700 रुपए में खरीदी।

सब अमन पर हंसने लगते हैं। मैं भी हंसना शुरू कर देता हूं लेकिन खुद पर।

ऐसे ही हमारे चार पांच दिन निकल जाते थे।

उस समय स्कूल में स्लेट और तख्ती हुआ करते थे। स्याही नहीं खरीद सकते थे ।  इसलिए कभी किसी चीज़ से बनाते थे तो कभी किस चीज़ से।

एक वो ज़माना था जब स्कूल की फीस के लिए तीन रुपए नहीं होते थे। और एक ये टाइम है जब 3000 की कोई value नहीं है।

 

ये सब सोचकर रोहन मुस्कुरा भी रहा था और उसकी आंखें भी भर आईं थीं । ऐसा होता भी क्यूं नहीं। आखिर उसने तो जिया था बच्चपन गरीब का |

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धन्यवाद

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6 comments

  1. Achi kahani hai

  2. Bachpan ki yaad dila di!
    Thanks

  3. This story related many of us. Thanks for remind us.

  4. Bahut khoob

  5. Bhacpan yad diladiya thanks 👍🏻

  6. Mera b bachpan asa hi tha thanku bachpan yaad Dilla Diya ….